राजसमंद। जिले के चंद्रभागा नदी व डींगरोल नाले के बीच में स्थित है देवों के देव काबरी महादेव मंदिर स्थित है यह मंदिर करीब 700 साल पुराना है केलवा राजघराने के ठाकुर ने शिखर का निर्माण करवाया था। पुरानी मान्यता है कि यहां शिवलिंग स्वत प्रकट हुए हैं हुआ यूं की गलवा गांव से जो गाये यहां घास चरने के लिए आती थी तो उनके थनों से यहां स्वत दूध गिरता था। ऐसे में गाय मालिक वाले ग्वाल से को प्रतिदिन झगड़ा करता था कि इसका दूध कौन निकाल लेता है तो उसके बाद वह गाय मालिक गाय के पास पहुंचा तो गाय के थन से दूध गिरते हुए नजर देखा नीचे देखा तो शिवलिंग नजर आया,ऐसे में उन्होंने यह बात ग्रामीणों को बताई ग्रामीण भी मौके पर पहुंचे। जहां पर खुदाई की इस उपरांत काबरी गांव से भी कई ग्रामीण दौड़कर आए और शिवलिंग की खुदाई की गई तो शिवलिंग स्वत ऊपर आ गया ऐसे में इनका नाम काबरी महादेव रखा गया है। इस मंदिर पर 4 सौ साल पुराने एक बलदेव महाराज की जीवित समाधि भी स्थापित है बताएं कि काबरी महादेव जी फूल का पर्चा है जो भी व्यापारी या ग्रामीण अपना नया प्रतिष्ठान शुरू करता है उससे पहले फुल मांगता है अगर फूल दे देते हैं तो उसकी मन्नत पूरी होती है।


सावन के तीसरे सोमवार पर शिव के मंदिर पर भक्तों का तांता लगा रहा। वहीं मंदिर की ओर आने वाले चारों रास्तों पर श्रद्धालुओं का आना जाना रहा सुबह से ही मंदिर परिसर पर श्रद्धालु पहुंचे हैं। भक्तों ने भगवान शिव का जलाभिषेक, दुग्धाभिषेक व बेलपत्र अर्पित कर पूजा अर्चना की।राजसमन्द जिला प्रमुख रत्नीदेवी चौधरी एवं समाजसेवी माधव चौधरी भी सावन माह के तीसरे सोमवार को मंदिर परिसर पर पहुंचे हैं और भगवान शिव को जलाभिषेक दुग्धभिषेक करके नमन किया और जिले भर में अमन चैन और खुशहाली की कामना की गई है। बताया की इस मंदिर के आसपास सभी समाज की सराय बनी हुई हैं। सावन के पूरे माह शिव भक्त कावड़ यात्रा भी लेकर आते हैं,भगवान शिव को प्रसन्न करते है। पंडितों के मंत्रोच्चारण और भक्ति गीतों के साथ काबरी महादेव मंदिर पूरे माह शिवभक्ति में लीन रहता है। इस मंदिर पर दर्शन के लिए राजसमंद भीलवाड़ा चित्तौड़ उदयपुर सहित मेवाड़ मारवाड़ क्षेत्र के कई श्रद्धालु आते हैं और दर्शनों का लाभ लेते हैं।

