चित्तौड़गढ़, (सलमान)। राजस्थान में अवैध खनन के खिलाफ युद्ध स्तर पर अभियान जारी है, लेकिन चित्तौड़गढ़ से आई एक ताजा कार्रवाई ने प्रशासन की कार्यशैली पर ही सवालिया निशान लगा दिए हैं। सवाल यह है कि क्या कार्रवाई से पहले ढ़ोल पीटना माफिया को भागने का रास्ता देना है?
बीती 2 जनवरी को चित्तौड़गढ़ की बेगूं तहसील के ग्राम बड़ाखेड़ा में राजस्व, खनिज और पुलिस विभाग की संयुक्त टीम ने अचानक दबिश दी। पांच अलग-अलग ठिकानों पर की गई इस कार्रवाई में करीब 440 टन अवैध बजरी का जखीरा जब्त किया गया। देखने में यह एक बड़ी कामयाबी लगती है, लेकिन स्थानीय हलकों में चर्चा कुछ और ही है। जानकार पूछ रहे हैं कि सिर्फ बजरी के ढ़ेर ही क्यों मिले, उन्हें जमा करने वाले ‘मालिक’ कहाँ गए?
●माफिया को ‘अलर्ट’ किसने किया?
चित्तौड़गढ़ जिला कलेक्टर आलोक रंजन की अध्यक्षता में टास्क फोर्स की बैठक हुई, जिसमें 15 जनवरी तक विशेष अभियान चलाने की सार्वजनिक घोषणा की गई। नाकेबंदी और पुलिस-वन विभाग की संयुक्त टीमों के गठन की बात खुलकर कही गई।आरोप लग रहे हैं कि जब प्रशासन खुद ही बता दे कि हम इस तारीख से यहां-यहां रेड मारेंगे, तो क्या यह माफिया के लिए ‘अलर्ट सायरन’ नहीं है?
●सिर्फ ‘स्टॉक’ जब्त, असली चेहरे कब आएंगे सामने?
440 टन बजरी की जब्ती प्रशासनिक सख्ती का प्रतीक जरूर है, लेकिन यह कार्रवाई केवल ‘सतह’ को छूती नजर आ रही है। असली बजरी माफिया और इस अवैध नेटवर्क के रसूखदार चेहरे अब भी पुलिस की पकड़ से दूर हैं।
Author: डेस्क/माय सर्कल न्यूज
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