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July 15, 2026 3:12 am

अल नीनो के प्रभाव से मानसून कमोजर, क्या हैं अल-नीनो और ला-नीनो, भारतीय मानसून पर कितना असर, पढ़े खबर

चित्तौड़गढ़, माय सर्कल न्यूज, सलमान। आज बात करेंगे उस प्राकृतिक घटना की जो भारत के खेतों से लेकर देश की अर्थव्यवस्था तक को प्रभावित करती है। हम बात कर रहे हैं अल नीनो और ला नीना की। आखिर क्या है ये घटनाएँ और कैसे ये तय करती हैं कि भारत में मानसून कैसा रहेगा.? प्रशांत महासागर की गहराइयों में होने वाली हलचल पूरी दुनिया के मौसम का मिजाज तय करती है।

◆ सबसे पहले बात करते हैं अल नीनो की

यह स्पेनिश शब्द है, जिसका अर्थ होता है छोटा बच्चा। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो जब प्रशांत महासागर की सतह का तापमान सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है, तो उसे अल नीनो कहते हैं। सामान्य दिनों में व्यापारिक हवाएं पूर्व से पश्चिम यानी दक्षिण अमेरिका से ऑस्ट्रेलिया की ओर बहती हैं, जिससे समुद्र का गर्म पानी ऑस्ट्रेलिया के पास जमा रहता है। लेकिन अल नीनो के दौरान ये हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं।
परिणामस्वरूप, गर्म पानी ऑस्ट्रेलिया के बजाय दक्षिण अमेरिका के तटों की ओर खिसक जाता है। इसका सीधा असर भारतीय मानसून पर पड़ता है। अल नीनो के कारण मानसूनी हवाओं की गति और नमी सोखने की क्षमता कम हो जाती है, जिससे भारत में बारिश कम होती है और कई बार सूखे जैसे हालात पैदा हो जाते हैं।

◆ समुन्द्र में ला नीनो बनने से क्या होता हैं..

इसके बिल्कुल विपरीत स्थिति होती है ला नीना। इसे अल नीनो की छोटी बहन भी कहा जाता है। इसमें प्रशांत महासागर का तापमान सामान्य से काफी कम हो जाता है। ठंडे पानी के कारण व्यापारिक हवाएं और अधिक मजबूत हो जाती हैं। भारत के संदर्भ में, ला नीना एक वरदान की तरह है। यह भारतीय उपमहाद्वीप में नमी लाने वाली हवाओं को गति देता है, जिससे मानसून सक्रिय रहता है और देश में अच्छी बारिश दर्ज की जाती है। देखा जाए तो भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए ये दोनों घटनाएं बहुत महत्वपूर्ण हैं। हालांकि जलवायु परिवर्तन के कारण अब इन घटनाओं का चक्र और प्रभाव अनिश्चित होता जा रहा है। मौसम विभाग की नजरें लगातार समुद्र की सतह के तापमान पर बनी रहती हैं, ताकि समय रहते सटीक अनुमान लगाया जा सके और किसान अपनी फसलों को लेकर सही निर्णय ले सकें। जुलाई 2026 में अल नीनो का प्रभाव भारतीय मानसून पर स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। प्रशांत महासागर में अल नीनो की स्थिति मजबूत हो रही है। नवीनतम आंकड़ों के अनुसार मध्य प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से काफी ऊपर दर्ज किया गया है, जो एक मजबूत अल नीनो घटना का संकेत है। कोई भी दो अल नीनो घटनाएं बिल्कुल एक जैसी नहीं होती हैं। जबकि ला नीना कभी-कभी तीन साल तक भी चल सकता है, अल नीनो आमतौर पर एक साल से अधिक समय तक नहीं टिकता है। एक अल नीनो घटना आमतौर पर 9 से 12 महीने तक बनी रहती है। यह चक्र हर 2 से 7 साल के अंतराल पर दोहराया जाता है।
अल नीनो के कारण भारत में बारिश लाने वाली मौसमी प्रणालियाँ कमजोर पड़ गई हैं। वर्तमान में भारत का मानसून एक ब्रेक फेज से गुजर रहा है, जिससे अधिकांश हिस्सों में बारिश की कमी देखी जा रही है। भारत मौसम विज्ञान विभाग ने संकेत दिया है कि जुलाई में बारिश दीर्घकालिक औसत से नीचे रहने की संभावना है। उत्तर-पश्चिम, पश्चिम-मध्य और दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत के कई क्षेत्रों में अगले कुछ दिनों तक बारिश की गतिविधियां कम रहने का अनुमान है। अल नीनो के प्रभाव से नमी कम होने के कारण देश के अधिकांश हिस्सों में अधिकतम और न्यूनतम तापमान सामान्य से अधिक दर्ज किया जा रहा है, जिससे गर्मी और उमस बढ़ रही है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार जुलाई के अंतिम सप्ताह में मैडेन-जूलियन ऑसीलेशन और बंगाल की खाड़ी में बनने वाले नए निम्न दबाव के क्षेत्रों के सक्रिय होने की संभावना है। इससे मानसून में थोड़ी रिकवरी हो सकती है और कुछ क्षेत्रों में बारिश की कमी की भरपाई हो सकती है। मौसम अनुकूल रहा तो राजस्थान में आगामी 18-19 जुलाई को फिर से बारिश की गतिविधियां देखने को मिल सकती हैं। जो करीब आगामी एक सप्ताह तक जारी रह सकती हैं।

डेस्क/माय सर्कल न्यूज
Author: डेस्क/माय सर्कल न्यूज

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