चित्तौड़गढ़। भारतीय किसान संघ के अफीम आयाम चितौड़गढ़ ने कोटा में डीएनसी अधिकारियों से मुलाकात कर अफीम उत्पादक किसानों की समस्याओं और वर्ष 2025-26 की नई अफीम नीति को लेकर चर्चा की। इस दौरान संघ ने ज्ञापन सौंपकर 10 बिंदुओं पर सुधार और संशोधन की मांग रखी।
संघ ने सबसे पहले वर्ष 2024-25 में रोके गए सीपीएस पद्धति के पट्टों को आगामी नीति में हर हाल में जारी करने की बात कही। प्रतिनिधियों ने कहा कि सरकार के गोदामों में पिछले चार वर्षों से सीपीएस पद्धति से उत्पादित डोडा चूरा जमा पड़ा है, जिसका उपयोग सरकार अब तक नहीं कर पाई है। ऐसे में किसानों को लुवाई-चिराई से अफीम (गोंद) निकालने की अनुमति दी जाए, ताकि उन्हें रोजगार और आय दोनों का साधन मिल सके।
किसान संघ ने यह भी मांग उठाई कि वर्ष 1990-91 से अब तक के सभी अफीम पट्टों को विभाग की वेबसाइट पर ऑनलाइन जारी किया जाए। इसमें पहले 1990-91 से 2005 तक के पट्टे और अगले वर्ष 2006 से 2025 तक के पट्टे शामिल किए जा सकते हैं। वहीं 95/96 से 97/98 तक के जो पट्टे अब तक जारी नहीं हो पाए, उन्हें भी इस बार की नीति में शामिल किया जाए। संघ ने यह भी याद दिलाया कि चार साल पहले वित्त मंत्री ने आश्वासन दिया था कि पुराने सभी पट्टे तीन वर्षों में जारी कर दिए जाएंगे।
ज्ञापन में वर्ष 2020-21 में नीमच फैक्ट्री के एक अधिकारी के भ्रष्टाचार मामले का भी जिक्र किया गया। आरोप है कि उस दौरान हजारों ईमानदार किसानों की अफीम को घटिया बताकर उनके पट्टे रोक दिए गए थे। संघ ने मांग की कि ऐसे सभी किसानों के पट्टों को पुनः जारी किया जाए।
संघ ने डोडा चूरा को एनडीपीएस एक्ट से बाहर निकालकर राज्यों के आबकारी एक्ट में शामिल करने पर भी जोर दिया। प्रतिनिधियों ने कहा कि अफीम गोंद निकालने के बाद डोडा चूरा में नशे की मात्रा मात्र 0.02 प्रतिशत रह जाती है, जो किसी भी प्रयोगशाला में मापी ही नहीं जा सकती। इस धारा के दुरुपयोग से किसान और आमजन भ्रष्टाचार का शिकार हो रहे हैं। पहले राज्य सरकारें इसे आमजन को राशन की तरह उपलब्ध कराती थीं और यह एक जीवन उपयोगी औषधि के रूप में भी काम आती रही है।
किसान संघ ने कहा कि अफीम नीति हर वर्ष सितंबर के पहले सप्ताह में घोषित होनी चाहिए। यदि नीति देर से आती है तो फसल बुवाई प्रभावित होती है और उत्पादन घट जाता है। पिछले वर्ष की नीति पिछले 22 वर्षों में सबसे देरी से घोषित हुई, जिससे किसानों को भारी परेशानी हुई।
संघ ने अफीम के दामों पर भी चिंता जताई। प्रतिनिधियों ने कहा कि कई वर्षों से अफीम के रेट स्थिर हैं, जबकि महंगाई लगातार बढ़ रही है। मजदूरी और दवाइयों का खर्च तक वर्तमान दरों से पूरा नहीं हो पा रहा है। इसलिए अफीम की कीमत कम से कम 10 हजार रुपये प्रति किलो तय की जानी चाहिए, जिससे किसानों को आर्थिक राहत मिले और ब्लैक मार्केटिंग पर भी अंकुश लगे।
ज्ञापन में यह भी सुझाव दिया गया कि जो किसान न्यूनतम औसत से अधिक अफीम उत्पादन करते हैं, उनकी अतिरिक्त दी हुई मात्रा का रिकॉर्ड रखा जाए। यदि अगले वर्षों में उत्पादन मौसम की मार से कम हो जाए, तो पूर्व में दी गई अधिक मात्रा को जोड़कर उनका पट्टा जारी किया जाए, चाहे उसके एवज में अलग से भुगतान न किया जाए। इस तरह पांच साल का रिकॉर्ड रखने से किसानों को बार-बार पट्टे रोके जाने की समस्या से राहत मिलेगी। इसके अलावा संघ ने एनडीपीएस एक्ट की धारा 8/29 को अफीम से हटाने या इसमें संशोधन करने की मांग की, ताकि अफीम उत्पादक किसानों और उनके परिवारों को राहत मिल सके। वहीं वृद्ध या गंभीर बीमारी से पीड़ित पट्टाधारकों को पूर्व की भांति जीवित नामांतरण की सुविधा उपलब्ध कराने पर भी जोर दिया गया।
इस अवसर पर प्रदेश अफीम आयाम प्रमुख बद्रीलाल, संयोजक शिवराज, जिला मंत्री लाभचंद और जिला उपाध्यक्ष भूरालाल मौजूद रहे।

