
चित्तौड़गढ़, माय सर्कल न्यूज, सलमान। खेतों में गेहूं और मक्के की लहलहाती फसलें देखना चित्तौड़गढ़ के लिए कोई नई बात नहीं है। देश के सबसे गर्म प्रदेशों में शामिल राजस्थान की इस धरती पर अब महाराष्ट्र का हापुस और उत्तर प्रदेश का दशहरी आम भी मिठास घोल रहा है। चित्तौड़गढ़ के बोजुंदा स्थित कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों ने अपनी आधुनिक तकनीक से इस नामुमकिन को मुमकिन कर दिखाया है। आमतौर पर जिन आमों को फलने-फूलने के लिए आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के खास मौसम और अनुकूल आबो-हवा की जरूरत होती थी, वे किस्में अब चित्तौड़गढ़ की धरती पर खूब फल-फूल रही हैं। वैज्ञानिकों ने यहां एक या दो नहीं, बल्कि पूरे 7 अलग-अलग किस्मों के आम सफलतापूर्वक उगाए हैं।

केंद्र से मिली जानकारी के अनुसार, अनुकूल वैज्ञानिक प्रबंधन के चलते यहाँ एक आम के पेड़ से 40 किलो से लेकर डेढ़ क्विंटल तक फल प्राप्त हो रहे हैं। इस मीठी क्रांति की शुरुआत साल 2008 में एक छोटे से प्रयोग के तौर पर हुई थी, जब कृषि विज्ञान केंद्र परिसर में इसके शुरुआती पौधे रोपे गए थे। आज लगभग 18 साल बाद यहाँ करीब 100 से अधिक पौधे इस पथरीली और गर्म मिट्टी को पूरी तरह रास आ चुके हैं और मदर प्लांट के रूप में लहलहा रहे हैं। जहाँ सामान्य बीजू पौधों को फल देने में 3 से 4 साल या उससे अधिक का लंबा वक्त लगता है, वहीं वैज्ञानिकों के मार्गदर्शन में तैयार इन मदर प्लांट से कलम तैयार की जा रही है।
◆ आम की किस्म और उसकी खासियत
आम्रपाली: यह छोटे कद के पौधों वाली किस्म है, जो सघन बागवानी के लिए बहुत उपयुक्त है।
दशहरी: उत्तर प्रदेश की यह सुप्रसिद्ध किस्म अब चित्तौड़गढ़ की धरती पर भी अपनी मिठास घोल रही है।
लँगड़ा: बेहतरीन स्वाद और शानदार सुगंध के लिए जानी जाने वाली यह किस्म यहाँ खूब फल दे रही है।
मल्लिका: आकर्षक रंग, बड़े आकार और मीठे स्वाद वाली यह एक उन्नत किस्म है।
हापुस (अल्फांसो): आमतौर पर महाराष्ट्र के तटीय इलाकों में होने वाला यह ‘फलों का राजा’ अब चित्तौड़गढ़ के मौसम में भी अपनी छटा बिखेर रहा है।
हयात: विशेष स्वाद और बेहतरीन गुणवत्ता के साथ अच्छी पैदावार देने वाली किस्म।
केसर: अपनी मनमोहक सुगंध, केसरिया रंग और मीठे स्वाद के लिए पहचानी जाने वाली लोकप्रिय किस्म हैं।
कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक, जुलाई और अगस्त का महीना ग्राफ्टेड पौधे तैयार करने के लिए सबसे बेहतरीन माना जाता है। इसी अवधि में सबसे ज्यादा कलम के पौधे तैयार किए जाते हैं। यहाँ से प्रगतिशील किसान इन ग्राफ्टेड पौधों को ले जाते हैं, जो महज दूसरे से तीसरे साल में ही फल देना शुरू कर देते हैं। वैज्ञानिकों की इस ऐतिहासिक कामयाबी ने चित्तौड़गढ़ के किसानों की तकदीर और खेती का तरीका दोनों बदल कर रख दिया है। पारंपरिक रूप से केवल गेहूं और मक्का उगाने वाले प्रगतिशील किसान अब तेजी से बागवानी की तरफ रुख कर रहे हैं।
हर साल कुछ किसान कृषि विज्ञान केंद्र से ग्राफ्टेड पौधे ले जाकर अपनी जमीनों पर रोप रहे हैं। बोजुंदा के कृषि विज्ञान केंद्र की इस ग्राफ्टेड तकनीक ने यह साबित कर दिया है कि अगर सही वैज्ञानिक मार्गदर्शन और पक्का इरादा हो, तो मरुधरा की मिट्टी से भी फलों का राजा सोना उगल सकता है।
Author: डेस्क/माय सर्कल न्यूज
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