
बेगूं। एक तरफ जहां प्रशासन विकसित शहर 2047 की संकल्पना को साकार करने के लिए भरसक प्रयास करने का दावा कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। बेगूं नगर में लगातार बढ़ती आवारा सांडों और पशुओं की संख्या स्थानीय निवासियों के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द और जान का खतरा बन चुकी है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या आवारा पशुओं के आतंक के बीच विकसित शहर की संकल्पना पूरी हो पाएगी?
गलियों में खेलने से डर रहे बच्चे, बुजुर्गों का निकलना दूभर
नगर के मुख्य चौराहों से लेकर तंग गली-मोहल्लों तक, हर जगह आवारा सांडों का जमावड़ा देखा जा सकता है। स्थिति इतनी विकट हो चुकी है कि बच्चे डर के मारे गली-मोहल्लों में खेलने से कतराने लगे हैं। बुजुर्ग बाजारों और सड़कों पर पैदल निकलने से भी घबराने लगे हैं।
इन इलाकों में सबसे ज्यादा आतंक
नगर का लालबाई फूलबाई चौक और पुराना बस स्टैंड जैसी व्यस्त जगहें अब आवारा पशुओं के मुख्य अड्डे बन चुके हैं। इसके अलावा विभिन्न रिहायशी इलाकों की गलियों में भी हर समय सांडों का जमावड़ा लगा रहता है, जो कभी भी आपस में भिड़कर राहगीरों को चपेट में ले लेते हैं।
बड़ा सवाल – आवारा सांडों की समस्या से निजात दिलाना सीधे तौर पर नगरपालिका प्रशासन की जिम्मेदारी है। लेकिन सड़कों पर बेखौफ घूमते ये पशु यह बताने के लिए काफी हैं कि स्थानीय प्रशासन इस गंभीर समस्या को लेकर कितना उदासीन है।
अभियान में बाधा, हादसे की आशंका
प्रशासन भले ही बेगूं को 2047 तक एक आधुनिक और विकसित शहर बनाने का खाका तैयार कर रहा हो, लेकिन मुख्य चौराहों पर लगा पशुओं का यह मेला ‘विकसित शहर अभियान’ की हवा निकाल रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रशासन पूरी तरह से मूकदर्शक बना हुआ है। लोग अब दबी जुबान में पूछ रहे हैं कि क्या पालिका प्रशासन को किसी बड़े हादसे का इंतजार है, जिसके बाद ही उनकी नींद टूटेगी?
स्थानीय नागरिकों ने मांग की है कि कागजी दावों से इतर, धरातल पर काम करते हुए इन आवारा सांडों को पकड़कर तुरंत गौशालाओं या सुरक्षित स्थानों पर भिजवाया जाए, ताकि बेगूं सचमुच सुरक्षित और विकसित बन सके।
Author: महेंद्र धाकड़ बेगूं
महेंद्र धाकड़ चित्तौड़गढ़ के अनुभवी संवाददाता हैं, जो स्थानीय और राष्ट्रीय समाचारों को लोगों तक सटीक और विश्वसनीय तरीके से पहुंचाने में सक्रिय हैं। माय सर्कल न्यूज़ के लिए रिपोर्टिंग करते है। -